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साल 2016 के ट्रेंड्स जिन्होंने ने भारतीय ट्रकिंग इंडस्ट्री को बदल कर रख दिया

Published On Dec 12, 2016By Mukul Yudhveer Singh

आधिकारिक रूप से वर्ष 2016 को अलविदा कहने का समय अब आ गया है। इस साल और पिछले साल भी कई सारे ट्रेंड्स (रुझान) थे, जिन्होंने देश की ट्रकिंग इंडस्ट्री पर अपनी गहरी छाप छोड़ी थी। इन में से बहुत से ट्रेंड्स इंडस्ट्री के लिए अनुकूल साबित हुए और कई अन्य ने लोहे के चने चब्वा दिए। इस के अतिरिक्त, कई सारे घटनाएँ ऐसी भी हुईं जिन्होंने ट्रकिंग दुनिया के अलग अलग वर्गों से अच्छी बुरी प्रतिक्रियाएँ बटोरीं। कुल मिलकर, यह साल रोमांचक रुझानों से भरा रहा, व साथ ही घटनाओं, नये नियमों और विधानों का बाज़ार भी ट्रकिंग इंडस्ट्री में गर्म रहा।

हम अब आप के सामने भारत में ऑनलाइन पब्लिश हुआ अपनी तरह का एक ऐसा आर्टिकल पेश करने जा रहे हैं, जिस में उन रुझानों / ट्रेंड्स के बारे में बताया जा रहा है, जिन्होंने देश के ट्रांसपोर्ट सेक्टर के काम करने के तरीके को को या तो बदल कर रख दिया या फिर अभी भी नये बदलाव लाने की प्रक्रिया में है। इन ट्रेंड्स को इस तरह से शॉर्टलिस्ट किया गया है की पहले उनके द्वारा छोड़े गये पिछले प्रभाव आते हैं, फिर वर्तमान में चल रहे ट्रेंड्स का मौजूदा असर और अंत में है भविष्य में आने वाले बदलाव जो की भारत की ट्रकिंग कम्यूनिटी को बदल कर रख देंगे। सभी ट्रेंड्स जिन को हमने चुना है उनमें ट्रकर्स, फ्लीट ओनर्स, ड्राइवर्स, कमर्शियल व्हीकल मेकर्स और साथ साथ भारत में कारोबार कर रहे स्वतंत्र बॉडी मेकर्स की दिशा बदल देने की क्षमता है। तो आइए देखते हैं!

नोट बंदी का असर

अर्थशास्त्र विशेषाग्यों (इकॉनॉमिक एक्सपर्ट्स) ने दोनों तरह की प्रतिक्रियाएँ दी, वह देश में सरकार के काले धन से लड़ने के कदम पर हित में भी दिखे और उस के खिलाफ भी बोले। लेकिन इस फ़ैसले से भारत की ट्रकिंग इंडस्ट्री पर ज़रूर असर पड़ा है। अभी अक्तूबर 2016 के पहले अपनी मंद चाल के बाद से कमर्शियल व्हीक्ल्स की सेल्स उठना शुरू ही हुई थी की, नोट बंदी का फ़ैसला आ गया। 500 रुपये और 1000 रुपये की नोट बंदी की सबसे बुरी बात यह रही की भारत सरकार ने किसी को भी इस के प्राई तैयारी करने का समय नहीं दिया। इस कदम से पहले ही देश में ट्रक सेल्स को अधर में रखा हुआ है, और यह माना जा रहा है की ट्रक सेल्स में इसी तरह का माहॉल आने वाले कुछ महीनों तक रहेगा, कम से कम दो महीने तो लगेंगे ही।

गौरतलब है की भारत स्टेज 4 (बीएस 4) और ट्रक्स में अनिवार्य ए.सी के नॉर्म 1 अप्रैल 2017 से लागू हो जाएँगे। इस का सीधा मतलब यह है की इन दोनों मानदंडों को पूरा करते हुए ट्रक्स मॉडल्स महँगे होंगे और जो लोग अपने पैसे बचाने के लिए 1 अप्रैल 2017 से पहले ट्रक्स खरीदने की सोच रहे हैं उन के पास डाउन पेमेंट्स के लिए कोई नकद राशि नहीं बचेगी। जैसे ही देश में नकद (केश) लेन-देन पटरी पर आता है, करीब जनवरी 2017 के बाद से, तो ट्रक के दाम सीधे आसमान छूते दिखाई देंगे। इसलिए तैयार हो जाइए क्योंकि हो सकता है की इस वित्तीय वर्ष की आखरी तिमाही में ट्रक सेल्स के नये रिकॉर्ड बनाए जाएँ देश में।

दूसरी तिमाही (क्यू2) में निराशाजनक सेल्स

कमर्शियल व्हीकल मेकर्स के लिए यह साल काफ़ी भारी गुज़रा है। कमर्शियल व्हीक्ल्स की सेल्स की तुलना यदि पिछले कुछ सालों की सेल्स से की जाए तो आँकड़े ट्रांसपोर्ट मार्केट को परेशन करने योग्य होंगे। एक्सपर्ट्स ने इस बात का अनुमान था की दूसरी तिमाही में भी ट्रक सेल्स पहली तिमाही की तरह शानदार रहेगी, लेकिन जीएसटी बिल को लेकर असमंजस ने सभी सेल्स भविष्यवाणियों पर अंकुश लगा दिया। फ्लीट ओनर्स, ट्रांसपोर्टेर्स और अनगिनत व्यक्तिगत ट्रक मालिक जीएसटी बिल लागू होने के बाद वेयरहाउसस का पुनर्गठन, डिसकाउंट स्कीम्स व इत्यादि का इंतेज़ार कर रहे थे।

भारी वर्षा जिसके चलते ट्रांसपोर्टेशन की डिमांड में कमी देखने को मिली, यह भी एक कारण रहा इस नीरस क्वॉर्टर का। पहली तिमाही के साथ सकारात्मक शुरुआत करने के बाद दूसरी तिमाही में सेल्स का ऐसे लुडक जाना किसी बड़े झटके से कम नहीं था। हालाँकि, गिरावट का दौर क्वॉर्टर 2 के अंत में दिवाली के त्योहार के साथ शुरू हो गया था, लेकिन फिर शुरू हुई नोट बंदी।

एयर कंडीशनर (ए.सी) का अनिवार्य अधिनियम

इस खबर से सबसे ज़्यादा खुशी देश के ट्रक ड्राइवर्स को हुई। भारत सरकार ने मोटर व्हीक्ल्स एक्ट 1988 में संशोधन करते हुए ट्रक मॅन्यूफॅक्चरर्स के लिए 1 अप्रैल 2017 से नये ट्रक्स में एयर कंडीशनर (ए.सी) का फिट करना अनिवार्य कर दिया। बहुत से एक्सपर्ट्स ने इस कदम पर बहस छेड़ते हुए कहा की ट्रक्स में एयर कंडीशनर लगाने से माइलेज के साथ साथ फ्रेट रेट्स पर भी असर पड़ेगा, लेकिन फिर भी देश के ट्रक ड्राइवर वर्ग का तो इस आदेश के जारी करने के बाद से खुशी का ठिकाना नहीं रहा।

अब यह देखना दिलचस्प होगा की किस तरह कमर्शियल व्हीकल मॅन्यूफॅक्चरर्स किस तरह से बीएस 4 नियमों व साथ ही अनिवार्य ए.सी नियमों का पालन शेष बचे करीब चार महीनों में किस तरह करते हैं। इस बदलाव के चलते, फ्लीट ओनर्स और ट्रकर्स को जल्द से जल्द नये ट्रक्स खरीदने होंगे, जिस से इस वित्तीय वर्ष के आखरी तिमाही में ट्रक की सेल्स में ज़बरदस्त इज़ाफ़ा होने के संकेत हैं।

फ्रेट रेट्स में बढ़ोतरी

हमारी रोज़मर्रा के उपयोग में आने वाली चीज़ें और कपड़े जो की हम पहनते हैं का बहुत सा दारोमदार फ्रेट रेट्स पर भी होता है जिस के द्वारा यह चीज़ें ट्रांसपोर्ट होकर हम तक पहुँचाई जाती हैं। फ्रेट रेट्स को इस तरह आसानी के साथ समझा जा सकता है की, फ्रेट चार्जस वो होते हैं जो की ट्रांसपोर्टेर्स एक या कई वस्तुओं को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए जो शुल्क लेते हैं वो फ्रेट रेट होता है। साल की पहली तिमाही के आख़िर में अचानक फ्रेट रेट्स में तेज़ी देखने को मिली। और यह इतनी ज़्यादा हो गयी की इसका असर वस्तुओं की प्राइसस पे भी पड़ने लगा जिस से महँगाई हो गई। ट्रक्स की शॉर्टेज, डीज़ल कीमतों में उतार चढ़ाव के साथ ही क्वॉर्टर1 में ट्रक्स की बढ़ती सेल्स के कारण अचानक चीज़ों के दाम बढ़ते दिखाई दिए।

यह बात हम सभी को जानना चाहिए की डीज़ल प्राइसस से देश की महँगाई का सीधा नाता है। इसलिए अगली बार यदि आप यह जान कर परेशन हो रहे हों की महँगाई क्यों हो रही है तो उस समय डीज़ल प्राइसस पर एक बार नज़र डालना मत भूलिएगा।

अंत में

यह सभी डेवेलप्मेंट्स और बदलाव चालू वित्तीय वर्ष के आखरी छ: माही में दिसचस्प मोड़ लेकर आ रहे हैं। जहाँ सवाल है नये साल का, तो ऐसा लगता है की जनवरी 2017 देश की ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री उतना अच्छा साबित नहीं होगा, परंतु अप्रैल 2017 से पहले के दौर में ज़रूर देश के कमर्शियल व्हीकल मॅन्यूफॅक्चरर्स को निश्चित रूप से मुस्कुराने का मौका मिलेगा।

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